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सॅभल कहाँ पाते।

बिखर ही जाना था,
सॅभल कहाँ पाते।
वो जिस तरह से बदला,
बदल कहाँ पाते।।

कुछ ऐसी बात थी जिसने,
मुझे झुकने न दिया;
जमीर बेंच के वैसे भी,
चल कहाँ पाते।

दाँव आते थे मुझे भी,
सभी तरह के मगर,
अपनो को छोड़ के आगे,
निकल कहाँ पाते।

उसी की बेरूखी ने ,
मुझको बना दिया पत्थर;
वो चाहता है ,मगर,
अब पिघल कहाँ पाते।

बात इतनी सी थी और,
तन्हा उम्र भर हम रहे;
सबके साँचो मे भला,
हम भी ढल कहाँ पाते।

सॅभल कहाँ पाते। सॅभल कहाँ पाते। Reviewed by VIJAY KUMAR VERMA on 6:07 AM Rating: 5

1 comment:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 06 एप्रिल 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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