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गजल

काम की बातों, को टाला जा रहा है।
सिर्फ वादों को,उछाला जा रहा है।।

बिलबिलाते भूख से,कितने मगर,
सिर्फ महलों को,निवाला जा रहा है।

मुस्करातीं चाभियां, धनवान की,
और गुदड़ी को,खंगाला जा रहा है।

जूते घिस कर,पैर मे चुभते रहे पर,
सिर्फ कलगी को,सम्भाला जा रहा है।

रोजी-रोटी की नही,चर्चा कोई,
ख्वाब जन्नत का,उछाला जा रहा है।

जो काटते हैं,और तलवा चाटते हैं।
ऐसे ही,सापों को पाला जा रहा है।
                  -विजय वर्मा
                22-05-2019
गजल गजल Reviewed by VIJAY KUMAR VERMA on 4:16 AM Rating: 5

5 comments:

  1. रोजी-रोटी की नही,चर्चा कोई,
    ख्वाब जन्नत का,उछाला जा रहा है।
    ...वाह। सभी अशआर बहुत उम्दा। खूबसूरत ग़ज़ल..

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  2. बेहतरीन भावों से सजी हुई खूबसूरत ग़ज़ल

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  3. बहुत बहुत धन्यवाद

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