Poetry, Ghazals and much more !!

फिर से-51

तुम्हारी आँखों के फैसले पर,
लगी हुई मन की आस फिर से।
बदन नहाया हुआ अश्क से,
मगर लबों पे है प्यास फिर से।।
उलझन मन कु बढ़ती जाये,
कभी हँसाये,कभी रुलाये;
सुखद अन्त हो बस इतना चाहूँ,
बने रहे तेरे खास फिर से।
                 -विजय वर्मा
                (फिर से-51)
              16-04-2017
फिर से-51 फिर से-51 Reviewed by VIJAY KUMAR VERMA on 12:30 AM Rating: 5

2 comments:

Powered by Blogger.