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फिर से-50

नुकीले काँटों ने पहनी फिर से,
भरोसे वाली लिबास फिर  से।
कुछ तो अनहोनी होनी   है,
बातों मे है मिठास फिर  से।
कहीं झूम के सावन बरसे,
याचक कहीं बूंद बिन तरसे;
किसी के हिस्से मे मयखाना,
किसी के खाली गिलास फिर से।
                        -विजय वर्मा
                       (फिर से-50)
                      13-04-2017
फिर से-50 फिर से-50 Reviewed by VIJAY KUMAR VERMA on 11:59 PM Rating: 5

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