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फिर से

किस प्रिय से मिलने को आतुर,
व्याकुल सी लगती धरा फिर से।
इक तो बसंत ,और अंगड़ाई,
कमनीय रूप धरा फिर से।।
गेंदा,गुलाब,चम्पा ,टेसू,
जूही,बेला से सजे गेसू;
पट पीत सुसोभित सरसो से,
हरियाली से रंग हरा फिर से।
                   -विजय वर्मा
                  (फिर से-39)
                 16-02-2017
फिर से फिर से Reviewed by VIJAY KUMAR VERMA on 6:05 PM Rating: 5

1 comment:

  1. प्राकृति के सौन्दर्य और प्रेम का दर्शन अहि ये रचना ... बहुत खूब ...

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